देश की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को आधुनिक तकनीक से जुड़ने की शुरुआत एक शुभ संकेत है। मध्यप्रदेश विधानसभा में सदस्यों की वर्चुअल उपस्थिति में कई राह दिखाई है। ऐसे में सवाल है कि एक एक वोट की कीमत की दुहाई देने वाले हमारे नीति नियंता क्या चुनाव में ऑनलाइन मतदान की दिशा में भी ऐसी पहल नहीं कर सकते? कोरोना महामारी ने दुनिया भर में वर्चुअल माध्यम के कई रास्ते खुले हैं । मध्य प्रदेश विधानसभा उपचुनाव के लिए चुनाव आयोग ने कोरोना संक्रमण के लिए 80 साल से अधिक वोटर और विकलांगों के वोट के लिए उनके घर तक पहुंचने का फैसला किया है । भले ही यह माध्यम पोस्टल बैलट का होगा। वैसे चुनाव आयोग चाहता, तो ऐसे मतदाताओं के घर तक मोबाइल वैन इत्यादि के जरिए ईवीएम मशीन पहुंचाने की कोशिश भी कर सकता था। भले ही प्रयोग के तौर पर ही सही, मतदान के प्रति अरुचि,उत्तर के मतदान केंद्र तक आने की मशक्कत आदि को देखते हुए ऐसे उपाय किए ही जा सकते हैं।
सही है कि देश की आबादी के एक बड़े तबके से जुड़े लोगों के पास के पास अभी भी इंटरनेट की पहुंच नहीं है। ऐसे में ऑनलाइन वोटिंग जैसा विकल्प पूरी तरह लागू किया जाना भी अभी मुफीद नहीं लगता। लेकिन कहीं तो शुरुआत करनी होगी। कोरोना संक्रमण के बीच मतदान के लिए लंबी कतारें, राजनीतिक दलों की रैलियां और चुनावी चौपाल के आयोजन कम खतरे वाले नहीं होंगे। ऐसे में ऐसी व्यवस्था आज नहीं तो कल करनी ही होगी, जिसमें मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल घर बैठकर कर सके। बेशक, इसके लिए इंटरनेट की उपलब्धता को आसान करना होगा। मतदान प्रक्रिया को आधार से जोड़कर वन टाइम पासवर्ड के जरिए वोट डालने लगे तो वोटिंग में फर्जीवाड़े की आशंका को भी रोका जा सकता है। यह कहा जा सकता है, ऑनलाइन मतदान का तरीका अभी भारत जैसे देश में कारगर साबित नहीं हो सकता लेकिन आंशिक तौर पर ही यह व्यवस्था लागू हो पाए, तो इसमें हर्ज भी नहीं होना चाहिए। दुनिया के दूसरे देश धीरे-धीरे ई- डेमोक्रेसी के जरिए विधान मंडलों की वर्चुअल बैठको और ई वोटिंग की ओर बढ़ रहे हैं। पुराने विकल्प बनाए रखते हुए अब इस समय शायद नया सोचने का है।
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